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गुरु गीता (27)
कर्म का फल या हमारी मेहनत का फल जब प्रसाद बन जाता है तब उसमें से दो चीजें प्रकट होती हैं !प्रसाद का अर्थ है प्रसन्नता और प्रसाद का अर्थ है मृदु ,जो भी हमें मिला उस मैं ही हम प्रसन्नता और मिठास अनुभव करलें तो फिर कहना ही क्या है ?इस दुनिया मैं सबको बहुत कुछ मिलता है , सब को सब कुछ नहीं मिलता ! देने वाले मालिक ने आपको बहुत कुछ दिया लेकिन सब कुछ नहीं दिया !हुछ न कुछ कमी रखी !अगर कमी पर ध्यान देते रहोग्र तो रोओगे और अगर जो मिला है उसका ध्यान करोगे तो खुशी आयेगी !